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CISF JAWAN COURT CASE : झारखण्ड हाईकोर्ट ने CISF जवान को बड़ी राहत देते हुए रद्द की बर्खास्तगी

CISF JAWAN COURT CASE

CISF JAWAN COURT CASE : झारखंड हाईकोर्ट ने लगभग 27 साल पुराने एक मामले में एक पूर्व CISF जवान को बड़ी राहत दी है।

अदालत ने कहा कि जिस सजा के तहत उसे सेवा से बर्खास्त किया गया था, वह आरोपों की तुलना में अत्यंत कठोर थी। यह मामला 1999 में बोकारो स्टील प्लांट में हुई चोरी की घटना से जुड़ा हैं।

 CISF JAWAN COURT CASE : क्या था मामला?

घटना मार्च 1999 की है, जब Central Industrial security force के एक जवान की Duty Bokaro steel plant में लगी थी,  उसी दौरान प्लांट परिसर से लगभग 100 किलों माइल्ड स्टील सामग्री चोरी हो गई। विभागीय जांच में आरोप लगाया गया कि जवान ने अपनी Duty में लापरवाही बरती, जिसके कारण यह चोरी संभव हो सकी।

जांच पूरी होने के बाद 25 अक्टुबर 1999 को उसे सेवा से हटा दिया गया I विभाग ने इसे गंभीर कदाचार मानते हुए बर्खास्तगी को उचित ठहराया I इस फैसले ने उसके पूरे करियर को अचानक समाप्त कर दिया।

CISF JAWAN COURT CASE : कानूनी लड़ाई की शुरूआत

बर्खास्तगी के बाद जवान ने विभागीय अपील और पुनर्विचार याचिकाएं दायर की, लेकिन सभी स्तरों पर उसे राहत नही मिली I अंततः उसने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया I वर्षो तक मामला लंबित रहने के बाद 2021 में हाईकोर्ट की एकल पीठ में उसके पक्ष में फैसला सुनाया।

एकल पीठ ने कहा कि भले ही विभागीय जाँच में लापरवाही साबित हुई हो, लेकिन सजा अत्यधिक कठोर प्रतीत होती है। अदालत ने बर्खास्तगी आदेश को रद्द करते हुए पुनर्विचार का निर्देश दिया। हालांकि, केन्द्र सरकार और सीआईएसएफ ने इस फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में अपील दायर की।

CISF JAWAN COURT CASE : डिवीजन बेंच का फैसला

17 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट की दो न्यायाधीशों की खंडपीठ ने अपील पर फैसला सुनाया I अदालत ने एकल पीठ के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि सजा आरोपों के अनुपात में नही थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुशासित बलों में कर्त्तव्यनिष्ठा अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका मतलब यह नही कि हर त्रुटि पर सबसे कठोर दंड दे दिया जाए।

अदालत ने यह भी गौर किया कि संबंधित जवान की सेवा रिकॉर्ड में इस घटना से पहले कोई नकारात्मक प्रविष्टि नहीं थी। उसका पिछला सेवा संतोषजनक था। ऐसे में केवल एक घटना के आधार पर सेवा समाप्त करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

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CISF JAWAN COURT CASE : समय और परिस्थितियों पर सवाल

मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि चोरी किस समय हुर्ई और क्या वह ठिक उसी अवधि में हुई जब वह जवान ड्यूटी पर था। रिकार्ड में यह उल्लेख था कि वह घटना से लगभग 15 मिनट पहले अपनी पोस्ट से हट गया था। लेकिन अदालत ने कहा कि इस तथ्य को इतनी स्पष्टता से स्थापित नही किया गया कि इसके आधार पर सेवा समाप्ति जैसी कठोर सजा दी जाए।

न्यायालय ने कहा कि विभागीय कार्रवाई में न्यायसंगत और संतुलन आवश्यक है। यदि लापरवाही साबित भी हो, तो सजा का निर्धारण करते समय कर्मचारी के पुरे सेवाकाल, परिस्थितियों और दोष की गंभीरता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

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CISF JAWAN COURT CASE : न्यायिक संतुलन का संदेश

यह फैसला केवल एक जवान को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यापक संदेश भी देता हैं कि अनुशासनात्मक मामलों में प्रशासनिक अधिकार असीमित नहीं है। अदालतें देखती है कि सजा न्यायोचित ही होनी चाहिए।

वर्दीधारी बलों में अनुशासन सर्वोपरि होता है, लेकिन न्यायालय मे यह स्पष्ट किया कि दंड का उद्देश्य सुधार और संतुलन होना चाहिए, न कि केवल दंड देना I यदि किसी जवान को पूरा सेवा रिकार्ड साफ-सुथरा रहा हो, तो एक घटना के लिए उसकी नौकरी समाप्त कर देना अत्यधिक कदम माना जा सकता है।

CISF JAWAN COURT CASE : व्यापक प्रमाद क्या होगा?

इस निर्णय से यह भी स्पष्ट होता है कि वर्षो बाद भी यदि किसी को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, तो न्यायिक समीक्षा संभव हैं। अदालतें प्रशासनिक फैसलों की जांच कर सकती है, खासकर तब जब सजा असंगत और असंतुलित प्रतीत हो।

करीब तीन दशक बाद आया यह फैसला न केवल उस पूर्व जवान के लिए राहत है बल्कि यह अन्य सरकारी कर्मचारियों के लिए एक उदाहरण भी है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई में न्याय और संतुलन आवश्यक तत्व है।

समाप्त!

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